तेरी ये बेबस सी ऑंखें ,कई सवाल उठाती है ,
जवाब देना है मुश्कील,मेरी आंखे कुछ कह नही पाती है,
निश्छल प्रेम के अंजाम के बारे मे पूछती है ,
कहाँ तक जाना है ,उस रास्ते के बारे मे पूछती है,
छोटे से घर के छत के बारे मे पूछती है,
गलियों मे घूमती सड़क के बारे मे पूछती है ,
मेरे अपनों के अटल विश्वास के बारे मे पूछती है,
सुबह के बाद शाम आयेगी ,इस विश्वास के बारे मे पूछती है,
बेतहा दर्द होने के बावजूद मेरे हँसी के बारे मे पूछती है,
शब्द नही मिल रहे पर मेरे हाल के बारे मे पूछती है ,
आँखों के कोने मे आंसू दबा कर मेरे रोने के बारे मे पूछती है ,
जवाब नही मेरे पास पर तुम्हारी आंखे सवाल पूछती है,
मझधार मे हूँ इन प्रशनो का जवाब कैसे दूँ ,
डूब रहा हूँ ,तुम्हे किनारे का विश्वास कैसे दूँ ,
तुम्हारे सवालों का जवाब कैसे दूँ ,जवाब कैसे दूँ .......
Wednesday, February 27, 2008
तुम्हारी आंखे बहुत पूछती हैं
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